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नारद की नज़र : दमोह में हाथ कमल में या कमल हाथ में

निष्पक्ष समाचार : दमोह में त्रि-स्तरीय पंचायत चुनाव व नगरीय निकाय चुनाव के दौरान शुरू हुआ दलीय दमखम लगातार जारी है। जिला पंचायत अध्यक्ष चुनाव में हाथ कमल पर खिलखिला रहा है, वहीं नगरीय चुनाव में भी कमल हाथ में समा जाने को आतुर दिखाई दे रहा है। पार्टी निष्ठा, मप्र में दलबदल की राजनीति से अब कोई मायने नहीं रख रही है बस वक्त के अनुसार समीकरण बिठायें जा रहे है। करोड़ों का हो चुका चुनाव अब करोड़ों की एक वोट पर केंद्रित हो गया है। त्रि-स्तरीय जिला पंचायत अध्यक्ष, उपाध्यक्ष व सातों जनपदों के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष बनाने के लिए जो बाड़े बंदी के बाद नोटों के थैला भरे बंडल घूमे हैं, वह चर्चाओं में छाया रहा है। 

      मोदी सरकार के आते ही काले धन की चर्चा हुई, लेकिन सरपंच और जनपद जैसे चुनावों में करोड़ों रुपए की थैलियां बंटना इस चुनाव का मुख्य आधार रहा है। अब नगर पालिका परिषद के अध्यक्ष व उपाध्यक्ष चुने जाने हैं, कांग्रेस के पास 17 तो भाजपा के पास 14 सदस्य हैं। इन दोनों दलों ने अपने प्रत्याशी तय नहीं किए हैं, 4 अगस्त को नगर पालिका परिषद के पदों पर अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव लडऩे वालों के फार्म निर्वाचन कार्यालय में भरे जाने हैं। 

       आशा जताई जा रही है कि जिला पंचायत चुनाव में ऐन मौके पर तीसरे प्रत्याशी की एंट्री कराने वाली टीएसएम अभी चुप बैठी है लेकिन ऐन वक्त पर अपनी एंट्री मार सकती है। इस चुनाव में दलीय संख्या के कोई मायने नहीं है, अब यह बात साबित हो गई है कि जो भी अध्यक्ष पद का दावेदार बड़ी थैली या बड़ा वायदा पार्षदों से करेगा वहीं सबसे बड़ा खिलाड़ी साबित हो जाएगा। जिससे जिला पंचायत की तरह यह भी स्थिति बन सकती है कि कांग्रेस के सदस्य भाजपा को और भाजपा के सदस्य कांग्रेस को वोट कर सकते हैं। स्थानीय चुनाव में हाथ व कमल का एक दूसरे में समाना, राजनीति की नई इबारत लिख रहा है। 

      नगर पालिका परिषद में निर्दलीय 7 हैं, जो सत्ते पे सत्ता हैं, यह पत्ते किस दल पर चढ़ते हैं इसकी गोटियां बिठाई जा रही हैं। भाजपा व कांग्रेस में अपने-अपने पार्षदों की बाड़ाबंदी की जा रही है, वहीं निर्दलीय भी मौके पर चौका मारने के लिए उतावले नजर आ रहे हैं।

       पथरिया में तो भईया गजब हो गओ यहां विश्व की नंबर वन पार्टी का कमल राज्य स्तर पार्टी के हाथी को सवारी का मौका दे रहा है। यहां पर भाजपा-बसपा गठजोड़ के बाद अध्यक्ष की कुर्सी बसपा के खाते में देने के लिए हरिद्वार में गंगा मैया की सौगंध खा ली है। नारद की नजर में जो चुनाव केवल एक दूसरे को हराने के लिए साबित हो रहा है, जिसमें पार्टी का कोई आधार नहीं है। 

       अब 5 जुलाई को होने वाला नगर परिषद अध्यक्ष व उपाध्यक्ष का चुनाव भी रोमांच से भरा होगा। जिसमें हार और जीत की नई पटकथा के साथ नए आरोप-प्रत्यारोपों की झड़ी लगेगी।

      जो हो रहा है वह तो होगा पर जनता अवाक है जब इन्हें ही अपनो को खरीदने बेचने की होड़ लगी रहती है तो 20 – 20 क्यों नहीं कर लेते, कम से कम सिस्टम की आपाधापी तो बचेगी, जब पंचायती राज व्यवस्था ही अपने मूल को खोती जा रही है तो जनता को इसमें बीच में लाने की क्या जरूरत है, क्योकिं पिछले सालों में भी इनका ज्यादा विकास हुआ और धरातल पर परिवर्तन का इंतजार होता रहा, ऐसे हालात को देखकर ग्रामीण शौचालय और सी सी सड़क याद आ जाते है जिन्हें बनाने में भी इन्ही के समान काफी राशि खर्च होती है पर वे भी दिखाई तो देते है पर उपयोगी नहीं होते।

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