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महाराष्ट्र से छुड़ाए गए दमोह जिले 19 बंधुआ मजदूर, ठेकेदार दिन में एक टाइम खाना देकर 20-20 घंटे कराता था काम

  • महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की कागल तहसील के बंदूर में गांव में दमोह जिले के 19 लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर काम कराया जा रहा था. जिन्हें दमोह श्रम विभाग ने रेस्क्यू कर छुड़ाया लिया है. ये 19 लोग कल दमोह पहुंच रहे हैं. इनमें 6 महिलाएं, 8 पुरुष और 5 नाबालिग भी शामिल हैं। जानकारी के अनुसार दमोह जिला निवासी योगेश और उसका साथी इन लोगों को ईंट भट्ठे में काम करने और मोटी मजदूरी दिलवाने का लालच देकर ले गया था।

दमोह. महाराष्ट्र के कोल्हापुर जिले की कागल तहसील के बंदूर में गांव में दमोह जिले के 19 लोगों को बंधुआ मजदूर बनाकर काम कराया जा रहा था. जिन्हें दमोह श्रम विभाग ने रेस्क्यू कर छुड़ाया लिया है. ये 19 लोग कल दमोह पहुंच रहे हैं. इनमें 6 महिलाएं, 8 पुरुष और 5 नाबालिग भी शामिल हैं। जानकारी के अनुसार दमोह जिला निवासी योगेश और उसका साथी इन लोगों को ईंट भट्ठे में काम करने और मोटी मजदूरी दिलवाने का लालच देकर ले गया था, लेकिन वहां ले जाने के बाद गन्ने के खेत के गन्ना काटने के काम लगा दिया. कोल्हापुर में बाबा सैयाद नाम का आदमी इनसे खेतों में जबरन गन्ने काटने के लिए मजबूर करता था. आरोपी ठेकेदार बाबा सैयद को पुलिस ने श्रम अधिनियम और आईपीसी की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज कर गिरफ्तार कर लिया है।

मजदूरों के साथ होता था जानवरों जैसा बर्ताव

श्रम निरीक्षक धर्मेंद्र नरवरिया ने बताया कि जन साहस एनजीओ की शिकायत पर जब दमोह से टीम रवाना हुई तो उन्हें इन मजदूरों के साथ होने वाले बर्ताव की जरा भी उम्मीद नहीं थी. इन मजदूरों को झोपड़े के नाम पर सामान्य कपड़ों का तंबू था. जिसमें इन सभी 19 लोगों को रखा जाता था. जहां पर बंधक बनाए गए ये मजदूर अच्छे से नींद भी पूरी नहीं कर पाते थे. मजदूरों में शामिल महिलाओं को एक घंटे में सभी के लिए खाना बनाकर तैयार करना होता था, उसके बाद गन्ने की कटाई में लगा दिया जाता था. इतना ही नहीं इन मजदूरों को एक टाइम का खाना दिया जाता था, जिसे तय में समय में खाना पड़ता था. अगर कोई मजदूर खाना खाने में अधिक समय लेता, तो ठेकेदार के आदमी उसको बहुत मारते थे यहां तक कि मजदूरों के मुंह मे लात मार देते थे।

सिर पर टॉर्च बांधकर करते थे खेतों में काम

बंधक बने मजदूरों ने बताया कि हमसे सुबह 4 बजे से अगली रात के 12 बजे तक काम कराया जाता था. अंधेरे में काम कराने के लिए मजदूरों के सिर पर टॉर्च बांध दी जाती थी और जानवरों की तरह काम कराया जाता था. इन बंधकों को 2-3 घंटे में ही अपनी नींद पूरी करनी होती थी। यह स्थान कोल्हापुर जिले का बंदूर गांव महाराष्ट्र-कर्नाटक की सीमा पर स्थित है, जहां इन मजदूरों से बंधक बनाकर काम लिया जा रहा था।

यह सदस्य रहे रेस्क्यू टीम में शामिल

श्रम निरीक्षक धर्मेंद्र नरवरिया, हेड कांस्टेबल दीपक करोसिया, आरक्षक छोटू चौहान, जन साहस की पूरी टीम जिनमें प्रमुख दीपक गहलोत देवास, एड सीताराम सोलंकी सलाहकार देवास, एड सूरज अहिरवाल दमोह, सतीश अहिरवाल ड्राईवर

प्रशासन की जिम्मेदारी

आज तो कोल्हापुर जिले से इन 19 बंधुआ मजदूरों को आज़ाद किया जा चुका है। लेकिन उनको महज आज़ाद करा देने से ही सरकार की ज़िम्मेदारी समाप्त नहीं हो जाती। सरकार को जानना होगा कि इन अभागों को अपना गाँव छोड़ने पर मजबूर क्यो होना पड़ा..? सरकार जिन कल्याणकारी योजनाओं का गुणगान हमेशा से करती आ रही है आखिर इन योजनाओं की जमीनी हकीकत क्या है..?

अगर सरकार के कागजी घोड़े इसी तरह दौड़ते रहे तो इन्हें ठेका-मज़दूरों के रूप में नए सिरे से बंधुआ बनने के लिए दूसरे राज्यों में जाना ही होगा। आज तक आज़ाद किए गए बंधुआ मज़दूरों का इतिहास यही रहा है।

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