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रूठे नही माने तो होगा त्रिकोणीय मुकाबला… ,स्थानीय मुद्दे और प्रत्याशी के चेहरे भी डालेंगे असर.!

आदर्श आचार संहिता 16 मार्च से पूरे जिले में लागू हो गई है विधानसभा 55 के उपचुनाव हेतु निर्वाचन आयोग द्वारा अधिसूचना जारी की गई जिसमें उम्मीदवारों के फार्म 30 मार्च तक जमा किए जा सकेंगे 31 मार्च को जांच की जाएगी 17 अप्रैल को मतदान किए जाएंगे और उम्मीदवार के भाग्य का फैसला 2 मई को किया जाएगा, यहां कुल मतदाता 239709 है जो प्रत्याशी के भाग्य का फैसला करेंगे

दमोह:- विधानसभा उपचुनाव में सबकी नजरें लगी हुई है। क्योंकि कांग्रेस के पूर्व विधायक के दल बदलने के कारण ही यह चुनाव हो रहा है वैसे यहां वर्षो से बेरोजगारी, पलायन और अन्य स्थानीय समस्यायें मौजूद रही है पर देखना यह है कि क्या ये मुद्दे वर्तमान में मौजूद रहेंगे या प्रत्याशी का चेहरा महत्वपूर्ण होगा क्योकिं पहले भी जातिगत समीकरण ज्यादा प्रभावी नहीं रहे है।

भाजपा जहां इस अवसर पर मेडिकल कॉलेज को ढाल बनाकर मत लेने की कोशिश करेगी, वही कॉंग्रेस भी वादाखिलाफी और बेरोजगारी को जनता के सामने प्रस्तुत कर अपने पक्ष में मतदान की उम्मीद कर सकती है।पिछले विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को मात्र 798 मतों से ही जीत हासिल हुई थी, जबकि 2013 में भाजपा मात्र 3.3℅ वोटो से कांग्रेस से जीत पाई थी और 2008 की बात करें तो भाजपा की मात्र 130 वोटो के अंतर से ही विजयी हुई थी । इससे स्पष्ट होता है कि भाजपा-कांग्रेस में हार जीत का अंतर कोई खास नहीं रहा है।

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पिछले 25-30 वर्षों से दमोह में भाजपा में एक ही चेहरा शीर्ष पर रहा और नए चेहरे बहुत कम सामने आए, अब कॉंग्रेस के पूर्व विधायक के भाजपा में शामिल होने के बाद से विभाजन का हिस्सा भी बन सकते है। लोगों की माने तो विगत कुछ वर्षों से भाजपा में केंद्रीय नेताओं के दखल के बाद से दमोह भाजपा के दो केंद्र बनना शुरू हो गए हैं जो बाद में जनता को दिखाई भी देने लगे।

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वर्तमान में दमोह उपचुनाव में प्रतिदिन राजनैतिक समीकरण बदल रहे हैं कांग्रेस से इस दौड़ में अजय टंडन, मनु मिश्रा, रोहन पाठक के नाम सामने आ रहे हैं, वहीं भाजपा से शीर्ष नेतृत्व द्वारा राहुल लोधी के पक्ष में वक्तव्य के बाद इसी पार्टी के पूर्व मंत्री जयंत मलैया जिनका जनाधार काफी मजबूत रहा है, और उनके पुत्र सिद्धार्थ मलैया भी युवाओं के बीच सक्रिय दिखाई दे रहे हैं। अन्य उम्मीदवार भी टिकट के लिये दावेदारी प्रस्तुत करते दिखाई दे रहे है कोई ग्रामीण और किसानों को अपना वोटबैंक बताता है तो कोई उपजाति को। देखना यह है कि पार्टी किसे उम्मीदवार बनाएगी। अन्य दलों और जनता के पास भी मुद्दे और चर्चाओं की कमी नहीं है अब देखना यह होगा कि विकास किसका होगा!

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तेजी से बदलते इस मौसम में कही ऐसा न हो जाये की पार्टी से रुष्ठ कोई निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में जनता के सामने प्रस्तुत हो जाये, जो प्रमुख पार्टियों के लिये चिंता का विषय भी हो सकती है और त्रिकोणीय मुकाबले की प्रबल संभावना बन जाये।

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