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गोविंद सिंह की पूर्व के सभी मामलों में मिली जमानत हुई निरस्त

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न्यायालय धमकी मामले में तत्कालीन एसपी हेमन्त चौहान और सहयोगियों के विरुद्ध जज सोनकर की शिकायत पर हाइकोर्ट दो सप्ताह में करेगा जांच, राजनीतिक रसूखदार और सामान्य व्यक्तियो को सरकार नही अपना सकती दोहरा रवैया सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी

दमोह – जिले के बहुचर्चित कांग्रेस नेता देवेंद्र चौरसिया हत्याकांड में आरोपी दमोह के पथरिया से बसपा विधायक रामबाई सिंह के पति गोविंद सिह की जमानत याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी है। आज हुई सुनवाई में कोर्ट ने विधायक पति की मौजूदा जमानत याचिका खारिज करने के साथ साथ पुराने मामलों में जमानत पर रहने वाले गोविंद सिंह की जमानतें भी रद्द कर दी है। पीड़ित पक्ष के वकील वरुण ठाकुर के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट ने मध्य प्रदेश सरकार एम पी पुलिस को भी फटकार लगाई है।

वर्ष 2019 में देवेंद्र चौरसिया हत्याकांड के नामजद आरोपी गोविंद सिंह को पुलिस विभाग से क्लीन चिट मिलने के बाद पूर्व जमानतों को निरस्त किये जाने वाली एक याचिका देवेन्द्र चौरसिया के पुत्र सोमेश द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई थी। इसी बीच स्थानीय हटा न्यायालय ने गोविंद सिंह को मामले में पुन: आरोपी बना लिया। गोविंद सिंह की गिरफ्तारी की कवायद के दौरान तत्कालीन पुलिस अधीक्षक हेमंत चौहान पर भी आरोपी पक्ष का बचाव करने एवं हटा न्यायलीन कार्य को प्रभावित करने के आरोप भी लगे थे। पीड़ित पक्ष के वकील वरुण ठाकुर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान इन सारे बिन्दुओ को उठाया गया, साथ ही आरोपी को सरकार के संरक्षण की बात भी सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान आई थी। आरोपी गोविंद सिंह पथरिया से विधायक रामबाई सिंह के पति है। मामले में राज्य सरकार, आरोपी पक्ष व याचिकाकर्ता की विस्तृत सुनवाई के बाद उच्चतम न्यायालय ने आज एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया।

वरुण ठाकुर ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने आदेश देते हुए लिखा के आरोपी गोविंद सिंह को विभिन्न मामलों में उच्च न्यायालय जबलपुर से आजीवन कारावास की सजा में मिली जमानत को निरस्त किया जाए। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि आरोपी ने मध्यप्रदेश सरकार का सहारा लेकर अपने प्रभाव से अनुचित लाभ लेने का प्रयास किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर तल्ख टिप्पणी करते हुए लिखा है कि सरकार आम आदमी और रसूखदार व्यकितयों के संबंध में कानून के दोहरे मापदंड नहीं अपना सकती, इस मामले में सरकार अपने संवैधानिक कर्तव्यों से विमुख रही है। सुप्रीम ने आगे कहा कि जिला अदालते न्यायालय स्तर की हमारी प्राथमिक संस्थाएं है और इनके पीठासीन को प्रभावित किया जाना किसी स्तर पर स्वीकार्य नहीं हो सकता तत्कालीन हटा जज को सुरक्षा मुहैया कराए जाने के साथ तत्कालीन एसपी के विषय मे आरोपों की जांच की बात भी सुप्रीम कोर्ट ने अपने निर्णय में कही है।

 

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