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माइसेम सीमेंट फैक्ट्री और पंचम नगर परियोजना के कुरूक्षेत्र का शकुनि कौन, किसने फेंके पांसे..?

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नारद की नजर – अब चुनावी दंगल की ताल सूरमा ठोकने लगे हैं तो हर बात चुनावी चाश्नी में डूबी हुई चुनावी चश्में से देखी जा रही है। तो वही नारद की नजर भी पिछले दो माहों से पंचमनगर पाइप लाइन के अंड़गा डालने वाली हाइडलबर्ग सीमेंट से संदर्भित छप रही खबरों की सुर्खियों पर पड़ी। यह लड़ाई उपर से तो पाइप लाइन बिछाने वाली कंपनी और सीमेंट कंपनी के बीच दिखाई देती है। लेकिन अंदरखाने में इसमें बड़ी राजनीतिक चौसर बिछ चुकी है। जी हां नारद ने जब अपने जादुई दर्पण में अंगुली फिराई तो फरवरी माह के घटनाक्रम पर देश के नामी गिरामी अंग्रेजी अखबार की अंग्रेजी में छपी खबर पर अंगुली रूक गई। अब हम आपको अंग्रेजी अखबार में छपी खबर का पूरा ब्यौरा बताते हैं।

केंद्रीय मंत्री प्रहलाद सिंह पटेल ने मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को एक पत्र लिखकर पंचम नगर सूक्ष्म सिंचाई परियोजना के क्रियान्वयन में हो रही देरी पर नाराजगी व्यक्त की है। साथ ही पत्र में लिखा है। अगर ड्राइंग बदली गई तो कई गांव पानी से वंचित हो जाएंगे। इस बीच डब्ल्यूआरडी के ब्यूरो ऑफ डिजाइन (बोधी) ने इस मुद्दे पर अपनी रिपोर्ट सौंप दी है। जिसमें दावा किया गया है कि ड्राइंग बदलने पर भारी मात्रा में अतिरिक्त स्टील (एमएस पाइप) की आवश्यकता होगी।

दमोह जिला कलेक्टर ने राज्य सरकार को एक रिपोर्ट सौंपी थी, जिसमें दावा किया गया था कि लगभग 239 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई की जा रही है। इस रिपोर्ट के विपरीत, परियोजना से संबंधित अधिकारियों की राय है कि 1250 हेक्टेयर में से 1100 हेक्टेयर से अधिक भूमि उपजाऊ है और मिट्टी में कैल्शियम की उपस्थिति के कारण किसानों को गेहूं का भरपूर उत्पादन हो सकता है। सूत्रों ने कहा कि दमोह के पथरिया क्षेत्र में एक सीमेंट कंपनी द्वारा पाइपलाइन बिछाने पर आपत्ति जताने के कारण परियोजना का काम रुक गया। उनका कहना है कि भारतीय सीमेंट कंपनी से विदेशी सीमेंट कंपनी को लीज पर ली गई जमीन का हस्तांतरण भी कथित तौर पर सवालों के घेरे में है।

मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान जो मार्च के प्रथम सप्ताह तक इस परियोजना का उद्घाटन करना चाहते थे। मुख्यमंत्री ने डिजाइन ब्यूरो डब्ल्यूआरडी (बोधि) (जो इस मुद्दे को देख रहा है) को इसका तुलनात्मक अध्ययन करने के लिए कहा था।

मामला एक सीमेंट कंपनी द्वारा 4.5 हेक्टेयर भूमि के माध्यम से पाइपलाइन बिछाने की अनुमति देने से इनकार करने के साथ शुरू हुआ, जो कि 1992 में राज्य सरकार द्वारा खनन चूना पत्थर के लिए पट्टे पर दी गई 1250 हेक्टेयर भूमि का हिस्सा है। यह भी आरोप लगाया जा रहा है कि एक वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और एक पूर्व मंत्री सीमेंट कंपनी का पक्ष ले रहे हैं। जबकि किसान खनन पट्टे और इसके आगे नवीनीकरण के खिलाफ हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि सीमेंट कंपनी को आवंटित निजी जमीन का 55 फीसदी हिस्सा आज भी किसानों के नाम पर है। स्टांप शुल्क चोरी की जांच होनी चाहिए। डब्ल्यूआरडी के अधिकारी आधिकारिक रेकॉर्ड पर अपनी सरकारी जमीन पर जोर देते हैं और योजना में किसी भी बदलाव से राजस्व का भारी नुकसान होगा। सीमेंट कंपनी इससे सहमत नहीं है। इस परियोजना की योजना लगभग 43 साल पहले 97 गांवों के लगभग 56,000 किसानों को लाभान्वित करने और बुंदेलखंड के सागर-दमोह क्षेत्र के 300 गांवों को पीने योग्य पानी की आपूर्ति करने के लिए बनाई गई थी।

अब नारद की नजर यहां भ्रमित हो रही है कि सुप्रीम कोर्ट से लेकर संविधान निर्माताओं ने इस बात पर जोर दिया है कि जन सामान्य के जरूरी मुददों के लिए लाभ की ईकाईयों को भी किनारे किया जा सकता है। केन्द्रीय राज्यमंत्री प्रहलाद पटेल भी 23 गांवों में जल्द पानी पहुंचाना चाहते हैं। तो महज 4.5 हेक्टेयर भूमि से पाइप लाइन निकल जाएगी तो किसका क्या बिगड़ जाएगा। जिसके पीछे यही बात समझ आती है कि मायसेम सीमंेट पर स्थानीय नेताओं की जड़े गहरी पैठ हुई हैं। इस पूरे मुददे पर विपक्षी कांग्रेस विधायक अजय टंडन का एक बोल भी न फूटना चर्चा के घेरे में है। मायसेम सीमेंट की अनेक कारगुजारियां हैं। जिन्हें स्थानीय नेतृत्व संरक्षण देता रहा है। जिसकी शह पर 56 इंची सीना फुलाए मायसेम सीमेंट कंपनी 23 गांवों को प्यासा रखने से भी बाज नहीं आ रहा है।

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